600 साल के सफर में मोमो बना लोगों की पसंद और हजारों के रोजगार का सहारा
सिलीगुड़ी : शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति होगा जिसने मोमो का स्वाद न चखा हो। बच्चे हों, युवा हों या बुजुर्ग आज मोमो लगभग हर उम्र के लोगों का पसंदीदा स्ट्रीट फूड बन चुका है। लाल तीखी चटनी और गरमा-गरम सूप के साथ इसका स्वाद और भी बढ़ जाता है। वेज हो या नॉनवेज, मोमो की अलग-अलग किस्में लोगों को खूब पसंद आती हैं। शाम होते ही खासकर युवाओं और बच्चों के बीच मोमो की मांग बढ़ जाती है। सिलीगुड़ी में तो ऐसे कई लोग हैं, जिनका रोजगार ही मोमो के कारोबार से चलता है। लेकिन क्या कभी आपने सोचा है कि आखिर मोमो भारत में इतना लोकप्रिय कैसे हुआ और इसका इतिहास क्या है?
बताया जाता है कि मोमो का इतिहास करीब 600 वर्ष पुराना है और इसकी शुरुआत तिब्बत के ठंडे इलाकों से मानी जाती है। कठोर ठंड और सीमित संसाधनों के बीच लोगों ने आटे या मैदे की पतली परत में मांस भरकर उसे भाप में पकाने का तरीका अपनाया। इसे तिब्बती भाषा में ‘मोग-मोग’ कहा जाता था, जिसे बाद में मोमोचा और फिर मोमो के नाम से जाना जाने लगा।
नेपाल के नेवार समुदाय की भूमिका
तिब्बत के साथ व्यापार करने वाले काठमांडू घाटी के नेवार व्यापारी इस व्यंजन से परिचित हुए। नेपाल लौटने के बाद उन्होंने इसमें स्थानीय मसालों, सब्जियों और तीखी चटनी का स्वाद जोड़ा। इस तरह मोमो नेपाल में भी लोकप्रिय होता गया और धीरे-धीरे इसका स्वरूप बदलता गया। भारत में मोमो के प्रसार का एक महत्वपूर्ण दौर 1950 और 1960 के दशक में आया, जब तिब्बती शरणार्थी भारत पहुंचे। दिल्ली के मजनू का टीला, धर्मशाला, दार्जिलिंग और सिक्किम जैसे क्षेत्रों से यह व्यंजन धीरे-धीरे देश के दूसरे हिस्सों तक पहुंचा। समय के साथ मोमो ने स्ट्रीट फूड के रूप में अपनी खास पहचान बना ली। आज वेज, पनीर, चिकन, फ्राइड और तंदूरी समेत मोमो की अनगिनत किस्में उपलब्ध हैं। कभी ठंडे पहाड़ी इलाकों में पेट भरने का साधन रहा यह व्यंजन आज सिलीगुड़ी समेत पूरे भारत में स्वाद और रोजगार दोनों का जरिया बन चुका है।

























